April 17, 2024
Karun Ras Ka Udaharan

करुण रस की परिभाषा, 30 उदाहरण – Karun Ras Ka Udaharan

Karun Ras Ka Udaharan :- आज हम हिंदी व्याकरण से जुड़े करुण रस के विषय में चर्चा करने वाले हैं, ना केवल करुण रस के बारे में बल्कि करुण रस का उदाहरण एवं करुण रस से जुड़ी अन्य जानकारियों के विषय में भी चर्चा करने वाले हैं, जब भी हम किसी काव्य, रचना को पढ़ते हैं या फिर किसी रंगमंच को देखकर हमारे मन में जो भी भाव उत्पन्न होता है उसे रस जाता है।

आमतौर पर रस 9 प्रकार के होते हैं तथा इन सभी रसों में से करुण रस को भी एक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है क्योंकि इस रस का प्रभाव सीधे मनुष्य के हृदय पर पड़ता है, यदि आप Karun Ras Ka Udaharan एवं करुणा से जुड़े अन्य जानकारियां विस्तार पूर्वक प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमारे द्वारा लिखे गए इस लेख को अंत तक अवश्य पढ़ें।


करुण रस का उदाहरण ( Karun Ras Ka Udaharan )

करुण रस का उदाहरण बताने से पुरवा हम आपको यह बता देना चाहते हैं, कि करुण रस क्या होता है ?

हम आपको उदाहरण बताने से पूर्व करुण रस के बारे में इसलिए बताना चाहते हैं, क्योंकि किसी वस्तु या कोई भी विषय के विषय में हम केवल उसके उदाहरण को पढ़कर के उस विषय को या फिर उस वस्तु को अच्छी तरीके से नहीं समझ पाएंगे।

यदि हमें उस वस्तु के बारे में जानकारी प्राप्त करनी है, तो हमें उस वस्तु के बारे में तथा उस वस्तु से जुड़े उदाहरण को भी ध्यान पूर्वक समझना होगा।

इसीलिए हम आपको करो रस का उदाहरण बताने से पूर्व करोड़ राशि के बारे में बताना चाहते हैं, जो निम्नलिखित है :-


करुण रस क्या है ?

किसी प्रिय व्यक्ति, वस्तु या किसी मनचाहे चीज की अनिष्ट या विनाश या फिर मनचाहे व्यक्ति का बिछड़ जाना या उसका कोई विनाश हो जाना जैसे भाव को सुन काया देखकर हमारे मन में जो भाव उत्पन्न होता है, उसी को करुण रस कहते हैं, करुण रस का स्थाई भाव शोक होता है, जब यही स्थाई भाव संचारी भाव, विभाग और अनुभाव से सहयोग करता है तो करुण रस की उत्पत्ति होती है।

आसान शब्दों में कहें तो कि जब हमें किसी से बिछड़ जाने का दुख या फिर कोई मनचाही वस्तु का विनाश हो जाना जैसे चीजों के खो जाने का दुख होता है अच्छा समय जो दुख की अनुभूति होती है उसी अनुभूति को करुण रस कहते हैं।


करुण रस के अवयव :-

स्थाई भाव शोक।

आलंबन विभाव बिछड़ा हुआ व्यक्ति या मनचाही वस्तु का विनाश।

उद्दीपन विभाव आलंबन का दाह कर्म एवं ईस्ट के गुण तथा इससे संबंधित वस्तुएं आदि।

 अनुभाव विलाप करना, मूर्छा, रुदन, प्रलाप, छाती पीटना, निस्वास, देव निंदा इत्यादि।

 संचारी भाव मोह, विसाद, जड़ता, स्मृति, ग्लानि निर्वेद, अपस्मार, दैन्य, उन्माद, व्याधि, निर्वेद आदि।

उदाहरण:-

करुण रस के कुछ उदाहरण हमने नीचे दिया है जिसे पढ़कर आप करो रस को अच्छी तरीके से समझ पाएंगे :-

  • हाय राम कैसे झेलें हम पनी लज्जा अपना शोक

गया हमारे ही हाथों से अपना राष्ट्र पिता परलोक

  • अभी तो मुकुट बंधा था माथ,

हुए कल ही हल्दी के हाथ,

खुले भी न थे लाज के बोल,

खिले थे चुम्बन शून्य कपोल.

हाय रुक गया यहीं संसार,

बिना सिंदूर अनल अंगार

बातहत लतिका वट

सुकुमार पड़ी है छिन्नाधार..

  • राम-राम कहि राम कहि, राम-राम कहि राम.

तन परिहरि रघुपति विरह, राउगयउसुरधाम॥

  • हे आर्य, रहा क्या भरत-अभीप्सित अब भी?

मिल गया अकण्टक राज्य उसे जब, तब भी?

  • धोखा न दो भैयामुझे, इस भांति आकर के यहां

मझधार में मुझको बहाकर तात जाते हो कहां

  • सोक बिकल सब रोवहिंरानि. रूपुसीलुबलुतेजु बखानी॥

करहिं बिलाप अनेक प्रकारा. परहिंभूमितलबारहिंबारा॥

  • उसके आशय की थाह मिलेगी किसको?

जनकर जननी ही जान न पायी जिसको?

  • विस्तृत नभ का कोई कोना,

मेरा न कभी अपना होना,

परिचय इतना इतिहास यही

उमड़ी कल थी मिट आज चली !

  • यह सच है तो अब लौट चलो तुम घर को .

चौंके सब सुनकर अटल केकयी-स्वर को

  • तदनन्तर बैठी सभा उटज के आगे,

नीले वितान के तले दीप बहु जागे .

  • अब कौन अभीप्सित और आर्य, वह किसका ?

संसार नष्ट है भ्रष्ट हुआ घर जिसका .

  • हा ! इसी अयश के हेतु जनन था मेरा,

निज जननी ही के हाथ हनन था मेरा .

  • जथा पंख बिनु खग अति दीना. मनिबिनु फ़न करिबर कर हीना॥

अस ममजिवनबन्धु बिन तोही. जौ जड़ दैवजियावै मोही॥

  • अर्ध राति गयी कपि नहिंआवा. राम उठाइ अनुज उर लावा ॥

सकइ न दृखितदेखिमोहिकाऊ. बन्धु सदा तवमृदृलस्वभाऊ ॥

जो जनतेऊँ वन बन्धुविछोहु. पिता वचन मनतेऊँनहिंओहु॥

  • ऐसे बेहाल बेवाइन सों पग,कंटक जाल लगे पुनि जोये.

हाय! महादुख पायो सका तुम,ऐये इतै न किते दिन खोये..

देखि सुदामा की दीन दसा,करुना करिके करुनानिधि रोये.

पानी परात का हाथ छुयो नहिं,नैनन के जल सौं पग धोये

  • तात तातहा तात पुकारी. परे भूमितल व्याकुल भारी॥

चलन न देखनपायउँतोही. तात न रामहिंसौंपेउ मोही

  • हा! वृद्धा के अतुल धन हा! वृद्धता के सहारे! हा!

प्राणों के परम प्रिय हा! एक मेरे दुलारे!

  • मम अनुज पड़ा है चेतनाहीनहोके, तरल हृदयवाली जानकी भी नहीं है.

अब बहु दुःख से अल्प बोला न जाता, क्षणभर रह जाता है न उद्विग्नता से॥

  • पथ को ना मलिन करता आना पद चिन्ह ना दे जाता जाना ,सुधि मेरे आंगन की जग में

सुख की सिहरन हो अंत खिली ॥

  • मैं क्षितिज भृकुटि पर घिर धूमिल चिन्ता का भार बनी अविरल रज-कण पर जल -कण हो बरसी नव जीवन अंकुर बन निकली

FAQ’S :- 

Q1. करुण रस की पहचान क्या है ?

Ans :- करुण रस ने अपने मनचाहे व्यक्ति या वस्तु से पुनः मिलने की आशा नहीं होती है।

Q2. करुण रस की परिभाषा उदाहरण सहित – Karun Ras Ka Udaharan

Ans :- जब किसी प्रिय व्यक्ति या मन चाहे वास्तु का कोई भी अनिष्ट या विनाश होता है तो हमारे मन में जो दुख की अनुभूति होती है,
 उसे करुण रस कहते हैं।

उदाहरण:- हाय राम कैसे झेलें हम पनी लज्जा अपना शोक

गया हमारे ही हाथों से अपना राष्ट्र पिता परलोक

अभी तो मुकुट बंधा था माथ,

Q3. करुण रस का स्थाई भाव क्या है ?

Ans :- करुण रस का स्थाई भाव शोक होता है।

Q4. हास्य रस का उदाहरण दीजिए ?

Ans :- हाथी जैसा देह, गैंडे जैसी चाल। 
तरबूजे-सी खोपड़ी, खरबूजे-सी गाल॥

Q5. शांत रस का उदाहरण

Ans :- मन रे तन कागद का पुतला। 
लागै बूँद बिनसि जाए छिन में,  गरब करे क्या इतना॥

निष्कर्ष :- हम आप सभी लोगों से उम्मीद करते हैं, कि आपको हमारे द्वारा लिखा गया आज का यह महत्वपूर्ण लेख ( Karun Ras Ka Udaharan ) अवश्य ही पसंद आया होगा। आज के इस लेख में हमने आपको करुण रस से संबंधित जानकारियां प्रदान कराई है।

यदि आपका हमारे द्वारा लिखा गया यह महत्वपूर्ण लेख Karun Ras Ka Udaharan पसंद आया हो, तो इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करना बिलकुल भी ना भूले और यदि आपके मन में इस लेख को लेकर किसी भी प्रकार का कोई सवाल या सुझाव है, तो कमेंट बॉक्स में हमें जरूर बताएं।


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