May 24, 2024
Mirabai ke guru kaun the

मीराबाई के गुरु कौन थे ? – Mirabai ke guru kaun the

Mirabai ke guru kaun the :- मीराबाई के बारे में कौन नहीं जानता, भगवान श्री कृष्ण की सबसे बड़ी भक्त मीराबाई। लेकिन क्या आप जानते है Mirabai ke guru kaun the ( मीराबाई के गुरु कौन थे  ) या मीराबाई का जीवन परिचय कैसा था ?

यदि नहीं, तो इस लेख को अंत तक पढ़े, क्योंकि हम यहां मीराबाई से संबंधित हर तरह की जानकारी देंगे।

दोस्तों आप जानते हैं, कि क्या कृष्ण ने मीरा से शादी की थी या नहीं ? या फिर मीराबाई की प्रभु कैसे हैं ?


मीराबाई कौन थी ? – Mirabai kaun thi ?

मीराबाई भगवान श्री कृष्ण की एक महान भक्त थी, जो 16वीं शताब्दी में भारत में जन्मी थी। इनका जन्म लगभग साल 1498 में हुआ था। मीराबाई राजपूताना के मेड़ता  के राजपूत राजघराने में पैदा हुए थी, उनके पिता का नाम रतन सिंह था और माँ का नाम कुमारी चौहान था।

मीराबाई जब महज 2 वर्ष की थी,  तब उनकी मां की मृत्यु हो गई थी जिसके बाद उनका लालन पोषण उनके दादा और  दादी के हाथों हुआ। उनके मां की मृत्यु के पश्चात ही उनके दादा राव दुदा उन्हें अपने साथ मेड़ता ले आए और वही उनकी देखरेख की। मीरा बाई को शिक्षा उनकी दादी मां ने दी थी, जो राजपूत संस्कृति और वेद शास्त्रों की विद्वता रखती थी।

मीराबाई का विवाह मेवाड़ के महाराणा सांगा के पुत्र भोजराज सिंह के साथ 1516 ईसवी में हुआ था। विवाह के कुछ सालों बाद ही मीराबाई के पति भोजराज सिंह की एक युद्ध में मृत्यु हो गई, जिसके बाद उन्हें सती करने का प्रयास किया गया लेकिन मीराबाई नहीं मानी।

जिसके बाद मीराबाई वृंदावन चली गई और फिर वहां से द्वारका, जहां उन्होंने कृष्ण भक्ति की और जोगन बन कर साधु संतों की तरह जीवन व्यतीत करने लगी।

मीराबाई की भक्ति भावना भगवान कृष्ण के प्रति थी और उनके भक्ति भाव से उन्होंने अपने जीवन को भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित कर दिया था। उन्होंने कई गीत लिखे जो उनके भक्ति और प्रेम की अनुभूतियों को दर्शाता है, उनकी रचनाएं संस्कृतf हिंदी और राजस्थानी भाषाओं में थी।

मीराबाई के गीत आधुनिक हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण अंग है और उनकी रचनाएं आज भी बहुत लोकप्रिय है। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रेम और सामाजिक विषयों पर व्यापक विचार व्यक्त किए हैं।

मीराबाई के अधिकांश गीत लोक गीतों के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने अपने गीतों में कृष्ण और उनकी लीलाओं के बारे में जिक्र किया है,  जो उनकी भक्ति को व्यक्त करते हैं।

उन्होंने अपने गीतों में महिला स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और आत्मसमर्पण जैसे मुद्दों पर भी  चर्चा की है। मीराबाई एक ऐसी संत महिला थी, जो अपने असाधारण भक्ति और प्रेम के लिए विश्व भर में जानी जाती है।


मीराबाई के गुरु कौन थे ? – Mirabai ke guru kaun the

मीराबाई के गुरु रविदास जी थे, जिन्हें विभिन्न नामों से जाना जाता है जैसे – भगत रविदास, रविराज, गुरु रविशंकर तथा संत रैदास जी। रविदास जी भारतीय महान संतो में से एक थे, जो 14वीं और 15वीं शताब्दी में जन्मे थे।

रविदास संत मत के संस्थापकों में से एक हैं, जिन्होंने वैष्णव धर्म को अपनाया था। वे दलित समुदाय से संबंधित है और उनकी शिक्षाओं में उन्होंने समाज के अलग-अलग वर्गों को समानता के साथ संजोया था।

मीराबाई रविदास जी के शिष्यों में से एक थी, जिन्होंने रविदास जी के उद्देश्यों को माना था। मीराबाई ने अपने जीवन के अंतिम दिनों तक उनके उपदेशों के अनुसार ही जीवन जीती रही और उन्हें अपने भक्ति और समर्पण का उदाहरण दिया।


संत रैदास जी कौन थे ?

संत रैदास या गुरु रविदास जी एक प्रसिद्ध संत और समाज सुधारक थे। वह भारतीय संस्कृति में गुरु शिष्य परंपरा के संस्थापकों में से एक हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से जाति व्यवस्था और अन्य सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।

गुरु रविदास जी का जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हुआ था, जो दलित समुदाय से संबंधित थे और उनके उद्देश्यों में समानता और भक्ति का संदेश था।

उन्होंने अपनी रचनाओं में जातिवाद, दूर व्यवहार, भ्रष्टाचार और बेईमानी के खिलाफ आवाज उठाई थी। गुरु रविदास जी को सीख धर्म का संदेश फैलाने का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।

उन्होंने आपस में संगठित समुदाय की स्थापना की, जो आज भी दुनिया भर में है।  उनकी रचनाओं में संगीत, कविता, भजन और दोहे शामिल थे, जो भक्ति और समाज सुधार के उद्देश्य से लिखे गए थे। उनकी रचनाएं संग्रहित है, जो उनके भक्तों के लिए महत्वपूर्ण साधन है।

गुरु रविदास जी ने अपने जीवन के दौरान उन लोगों की सेवा की जो समाज के सबसे निचली श्रेणी मे थे और उन्हें धर्म के अधिकारों से वंचित किया गया था।

उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दिनों तक धर्म का संदेश फैलाने के लिए लगातार काम किया। उनकी मृत्यु के बाद उनके शिष्यों ने उनके उपदेशों और रचनाओं को संग्रहित कर उनकी समाज सुधार और धर्म के कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए संस्था बनाई।

गुरु रविदास जी के शिष्यों में से एक मीरा बाई थी, जो हमेशा उनकी बातों में खो जाया करती थी।  मीराबाई को गुरु रविदास जी ने अपनी संतान बनाया था, उन्होंने मीराबाई को अपने आश्रम में रखा था और उन्हें हमेशा ध्यान करना सिखाते थे।

मीराबाई ने भी अपने गीतों व कविताओं में गुरु रविदास जी की महिमा गाई है। मीराबाई ने भी अपने अंतिम दिनों तक गुरु रविदास जी के उपदेशों का अनुसरण किया था।


मीराबाई की रचनाएं ?

मीराबाई एक महान कृष्ण भक्त तथा कवियत्री थी, उनकी रचनाएं विशेष तौर पर भगवान श्री कृष्ण की महिमा के लिए जानी जाती है। उनकी रचनाएं अधिकतर हिंदी और बृज भाषाओं में लिखी गई हैं। हम यहां मीराबाई द्वारा लिखी गई कुछ महत्वपूर्ण रचनाओं के बारे में बता रहे हैं। जैसे कि –

मोरो तो गिरिधर प्यारा रे यह रचना मीराबाई ने खासतौर पर भगवान श्री कृष्ण के लिए लिखी थी। यह रचना भगवान कृष्ण के प्रति उनकी प्रेम और भक्ति को व्याप्त करती है।

पढ़पढ़ ब्रह्मचारिणी मीराबाई ने यह रचना खास तौर पर महिलाओं को संदेश देने के लिए लिखा था। यह लोगों को यह बताता है, कि शिक्षा हर किसी के लिए कितना आवश्यक है।

मेरे तो गिरधर गोपालमेरे तो गिरधर गोपाल नामक काव्य मीराबाई की सबसे लोकप्रिय रचनाओं में से एक है, जो भगवान कृष्ण की महिमा को बहुत ही अच्छे ढंग से बयान करती है।

पद पद गोविंद भजन इस रचना में मीराबाई ने ना केवल श्री कृष्ण की महिमा को अच्छी तरह से बयान किया है बल्कि इसमें उन्होंने उनके उपासना का वर्णन भी अच्छे से किया है।

वारण वारण हाले जीरो मीराबाई की वारण वारण हाले जीरो नामक रचना भी एक अन्य प्रसिद्ध रचना में से एक है। जिसमें उन्होंने भगवान श्री कृष्ण की महिमा को बहुत ही प्यारे और अनमोल शब्दों के साथ व्यक्त किया है।

पद पद में मिलूंगी आपको यह कविता उन की विश्वास को लगभग कि का प्रतिनिधित्व करती है और उनके प्रेम के भावों को व्यक्त करती है।

मीराबाई अपनी कविताओं के माध्यम से भगवान कृष्ण की महिमा और उनके प्रेम के उदाहरणो को  लोगों तक पहुंचाया करती थी। उनकी कविताओं में प्रेम, भक्ति और उनके जीवन के अनुभव का वर्णन होता है।

उनकी कविताओं में सरलता और संगीतमयी भावनाएं होती हैं, जो लोगों को उनसे जुड़ने में मदद करती है।  मीराबाई ने अनगिनत कविताएं, पद, भजन और आरती लिखी हैं, जो आज भी बहुत अधिक लोकप्रिय हैं।


FAQ’S :-

Q1. मीरा बाई कौन थी ?

Ans - मीरा बाई भगवान श्री कृष्ण की सबसे बड़ी भक्त थी। जिसने अपना पूरा जीवन भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में 
बीता दिया। एक महान कवित्री रचनाकार भी थी।

Q2. मीरा बाई के प्रथम गुरु कौन थे ?

Ans - मीरा बाई के गुरु संत रविदास जी थे। जिन्होंने कई बार मीराबाई की जानकी बचाई थी और उन्हें भक्ति का 
संपूर्ण ज्ञान भी दिया था।

Q3. मीराबाई किस धर्म की थी ?

Ans - मीराबाई धर्मनिरपेक्ष थी और उन्होंने अपने जीवन में भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में समस्त जातियों को शामिल कर दिखाया था।

Q4. मीराबाई की रचनाएं क्या है ?

Ans - मीराबाई नेम भगवान कृष्ण के प्रति अपनी अनमोल प्रेम भावना को अभिव्यक्त करते हुए कई कविताएं लिखि जैसे, 
जो तुम तोड़ो पैजन भाई, चारों ओर हरि का समा, बढ़ाएं द्वार तोरे देखन को, हमारे गिरधर गोपाल दूसरो न कोई।

Q5. क्या कृष्ण ने मीरा से शादी की थी ?

Ans - हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि श्री कृष्ण ने मीराबाई से शादी की थी, लेकिन इस बात का कोई इतिहास ही 
प्रमाण नहीं है। परंतु श्री कृष्ण और मीरा बाई के बीच एक अत्यंत पवित्र और अनुराग पूर्ण संबंध था उनकी भक्ति और प्रेम 
के विषय में था मीराबाई ने अपनी रचनाओं में श्री कृष्ण के अत्यंत प्रेम संबंध का वर्णन किया है स्पष्ट होता है कि उनका 
संबंध केवल भक्ति और प्रेम पर आधारित था।

Q6. मीरा किसका अवतार थी ?

Ans - कुछ लोगों का मानना है, कि द्वापर युग में मीराबाई भगवान श्री कृष्ण की ललिता नामक सखी थी, जो कि इस युग में
एक महान कृष्ण भक्त के रूप में अवतरित हुई।

निष्कर्ष :- 

आज के इस लेख में हमने Mirabai ke guru kaun the ( मीराबाई के गुरु कौन थे ? ) के बारे में बताया है। साथ ही हमने यहां मीराबाई के गुरु यानी संत रैदास जी कौन थे तथा मीराबाई का जीवन परिचय की जानकारी भी हमने यहां दि है।

उम्मीद करते हैं,  यहां दी गई जानकारी आपके लिए बेहद उपयोगी साबित हुई होगी। इसी के साथ यदि इस विषय से संबंधित आपको और अधिक जानकारी चाहिए, तो हमें कमेंट के माध्यम से हमें जरूर बताएं और साथ ही यह लेख आपको कैसा लगा इसके बारे में भी हमें जानकारी अवश्य दें।


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